रवींद्रनाथ टैगोर के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी 2023

रवींद्रनाथ टैगोर के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी 2023 



रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्हें गुरुदेव, रबींद्रनाथ ठाकुर, रवींद्रनाथ तगोर, और ठाकुर दादा भी कहा जाता है, एक महान भारतीय कवि, विचारवंत, लेखक, रचनाकार, शिक्षाविद, दार्शनिक और समाज सुधारक थे। उन्होंने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानवता के लिए विश्वास के साथ जीवन जिया था। उनकी लेखनी से व्यक्तिगत और सामाजिक विषयों पर विचार की धारा बहती रही है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ, नाटक, गीत, और निबंध विश्वभर में लोकप्रिय हो गई हैं और आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता (कलकत्ता), बंगाल के जन्मस्थान जोधपुर पार्क में हुआ था। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर एक प्रसिद्ध विद्वान्, लेखक और समाज सुधारक थे। उनकी मां शरदादेवी टैगोर भी एक लेखिका और संगीतज्ञ थीं। टैगोर का शिक्षा के क्षेत्र में रूचि था और उन्होंने इंग्लैंड, ब्रिटिश इंडिया, और अमेरिका में विदेशी शिक्षा भी प्राप्त की।

टैगोर के जीवन के विभिन्न दशकों में कई उदारवादी सोचीने और दर्शनिक विकास के चर्चित चरण रहे हैं। उनकी लेखनी के माध्यम से धार्मिकता, मानवता, प्रकृति, स्वाधीनता, और समाज सुधार के सिद्धांतों का उद्घोष हुआ। उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देने वाले विभिन्न संस्थानों की स्थापना की।

रवींद्रनाथ टैगोर की कविताएँ उनके साहित्य के मुख्य रूप से गुणवत्ता और अध्यात्मिकता के कारण विख्यात हो गई हैं। उनकी कविताएँ बंगाली भाषा में लिखी गई हैं और उन्होंने संस्कृत, हिंदी, उर्दू, और अंग्रेजी भाषा में भी कई रचनाएँ की।


कवि टैगोर की कुछ प्रसिद्ध कृतियों में से कुछ नाम हैं:

  • गीतांजलि (Gitanjali)
  • गोरा (Gora)
  • बालका (Balaka)
  • चित्रायाँ (Chitra)
  • नौकादुबी (Naukadubi)
  • नस्तनीर (Nastanirh)
  • साधना (Sadhana)
  • मलञ्च (Malancha)

टैगोर ने अपने लेखनी से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर भी विचार किए। उन्होंने महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, समाजिक उत्थान, विदेशी अध्ययन, और विचारशीलता के महत्व को उजागर किया। उन्होंने बंधनों से मुक्त होकर विश्व के साथ जुड़े रहने के लिए अपने विचारों को व्यक्त किया।

कवि टैगोर के जीवन के अंतिम वर्षों में स्वाधीन भारत के लिए उनके योगदान को स्वीकारा गया और 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार साहित्य में दिया गया। इससे वे पहले भारतीय हुए, जिन्हें नोबेल पुरस्कार के साथ सम्मानित किया गया।


रवींद्रनाथ टैगोर: भारतीय साहित्य के दिव्य दर्शनीय रत्न

प्रस्तावना:

भारतीय साहित्य की धरोहर में एक ऐसा नाम है जो अपनी सुंदर कविताओं, कहानियों, नाटकों, और संगीत की श्रेष्ठता के लिए विख्यात है - रवींद्रनाथ टैगोर। उनकी रचनाएँ भारतीय संस्कृति, धरोहर, और विचारधारा को प्रशंसा करती हैं, जो समृद्धि, एकता, धार्मिकता, और विश्वास के प्रतीक हैं। टैगोर के जीवन का यह निबंध उनके लेखन के महत्वपूर्ण पहलुओं, साहित्यिक योगदान के बारे में विचार करेगा, और उनके दृष्टिकोण और संदेश को समझने का प्रयास करेगा।


प्रारंभिक जीवन:

रवींद्रनाथ टैगोरर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता, भारत में हुआ था। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर भारतीय नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध कवि और शिक्षक थे और मां शरदादेवी टैगोर एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। टैगोर के शैक्षिक अनुभवों ने उन्हें गहरे धार्मिक मूल्यों और संस्कृति के प्रति प्रेम की शिक्षा दी। वे होमस्कूल में शिक्षित हुए और बाद में लंदन और कैंब्रिज में अध्ययन करने गए।


लेखनी योगदान:

रवींद्रनाथ टैगोर का साहित्यिक योगदान उनकी प्रेरणादायी कविताओं से शुरू होता है। उनकी पहली कविता 'अभिलाषा' 1877 में प्रकाशित हुई, जिसे उनके पिता ने लिखा था, और यह उनके लेखन का आदिकालिक उदाहरण है। उनके बाद के कविताएँ, जैसे 'सोनार तोरी', 'गीतांजलि', 'फेरिवाला', 'गीता रहस्य', आदि ने भारतीय साहित्य में अमित चिन्ह छोड़ा।

उनके काव्य रचनाएँ जीवन, प्रकृति, प्रेम, भक्ति, विचारधारा, और संघर्ष के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करती हैं। उनके शब्दों में रस और भाव का विशेष महत्व होता है जो पाठकों के दिलों में समरसता भरता है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्राकृतिक सौंदर्य का सर्वोच्च प्रशंसा की और विभिन्न रंगों, ध्वनियों, और सुगंधों के साथ नारी के सौंदर्य को भी गीत-गएण्ड लिखा।

टैगोर के नाटक उनके समय के साहित्यिक दृष्टिकोण के अनुसार महत्वपूर्ण थे। उनके नाटक 'विसर्जन', 'रक्तकराब', 'चांदोलिका', 'छिन्नपटी', आदि उनके काव्य-नाटकों के उत्कृष्ट उदाहरण थे। ये नाटक समाज में विभिन्न मुद्दों पर विचार करने और समस्याओं का समाधान करने के लिए उपयुक्त थे। टैगोर के नाटक भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक अद्भुत योगदान के रूप में जाने जाते हैं।


संगीत का दीवाना:

रवींद्रनाथ टैगोर का साहित्य शिर्षक सिर्फ कविता और कहानियों से सिमित नहीं था, वे एक उत्कृष्ट संगीतकार भी थे। उन्होंने बांग्ला भाषा में एक संगीतीय परंपरा स्थापित की, जिसमें उनके बहुत से गीत और संगीतिक रचनाएँ शामिल थीं। उन्होंने स्वयं के रचनात्मकता को प्रकट किया और भारतीय संगीतीय विरासत को आधुनिक बनाने में योगदान दिया। उनका संगीत भजनों, रागगीत, गानों, और ओपेरों में भी उत्कृष्ट माना जाता है।


प्रेरक संदेश:

रवींद्रनाथ टैगोर के दृष्टिकोण में संसार को संरक्षण करने के लिए एक व्यापक संदेश था। उनकी रचनाएँ मानवता, प्रेम, समरसता, एकता, और शांति के लिए प्रेरित करती थीं। उन्होंने विश्ववादी भावनाओं को अपनाया और समाज के सभी वर्गों के बीच समरसता को प्रशंसा की। उनके कविताओं और कहानियों में धर्म, संस्कृति, और नैतिकता के महत्व का उच्चारण किया गया। टैगोर के संदेश ने दर्शकों को उत्साहित किया और सोचने पर मजबूर किया।


समापन:

रवींद्रनाथ टैगोर एक ऐसे साहित्यिक गीण्ड थे जिनके शब्द, संगीत, और संदेश ने समर्थ रूप से लोगों के दिलों में जगह बना ली थी। उनका योगदान भारतीय साहित्य, संस्कृति, और संगीत के विकास में महत्वपूर्ण रहा है। टैगोर के साहित्यिक अभियान ने उन्हें पूरे विश्व में एक अद्भुत पहचान दिलाई, और उनकी रचनाएँ आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।

समय की गाती में बदलाव होते हैं, परंतु रवींद्रनाथ टैगोर के संदेश और साहित्य की महिमा हमेशा अटूंटी रहेगी। उनके शब्द और संगीत से हमें सच्चे समरसता और प्रेम की महत्वपूर्ण सीख मिलती है। उन्होंने विश्व को एक सकारात्मक योजना बनाने के लिए प्रेरित किया और सभी मनुष्यों के साथ मिलजुल कर एक समरसता से जीने के लिए प्रेरित किया। रवींद्रनाथ टैगोर के साथ उनके अद्भुत साहित्य का सम्मान करना और उनके संदेश को जीवन में अमल करना हमारी दायित्व भी है।


रविंद्र नाथ टैगोर की मृत्यु कब और कैसे हुई?

रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु 7 अगस्त 1941 को हुई थी। वह 80 वर्षीय थे जब उनका निधन हुआ। उनकी मृत्यु उनके निजी निवास, जो कोलकाता के जोरासांको हॉल में स्थित था, में हुई। उनका निधन देश और संस्कृति के विभिन्न स्तरों पर भावना और श्रद्धांजलि से सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु भारतीय साहित्य और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण युग के समाप्त होने का संकेत दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु के बाद, उनके लेखन, संगीत, और साहित्यिक योगदान को सम्मानित किया गया और उनके नाम से विभिन्न स्मारक स्थापित किए गए। उनके रचनात्मक योगदान ने भारतीय संस्कृति को एक नया मार्ग दिया और भारतीय साहित्य में अपनी अलग पहचान छोड़ी। उनकी कविताएँ, नाटक, और संगीत रचनाएँ आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं और उनका साहित्य उन्हें अमर बना देता है।

रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु एक साहित्यिक महानतम युग के अंत की घटना थी, लेकिन उनकी रचनाएँ और संदेश आज भी हमारे जीवन में प्रेरणा और समरसता का स्रोत हैं। उनका नाम अब भी सम्मान, प्रेम, और श्रद्धा से लिया जाता है और उनके साहित्यिक योगदान ने उन्हें एक श्रेष्ठ कवि और संगीतकार के रूप में जीवन भर के लिए याद किया जाएगा।


टैगोर का दूसरा नाम क्या है?

रवींद्रनाथ टैगोर का दूसरा नाम "गुरुदेव" था। उन्हें भारतीय संस्कृति में "गुरुदेव" के रूप में भी प्रसिद्ध किया जाता है। वे भारतीय साहित्य, संस्कृति, और विचारधारा के प्रमुख प्रवक्ता थे और उनके संदेश ने लोगों को एक सकारात्मक दृष्टिकोण में सोचने के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा, उनके गुरु शिष्य परम्परा में भी उन्हें गुरुदेव के रूप में याद किया जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर का नारा क्या था?

रवींद्रनाथ टैगोर का नारा "जन गण मन अधिनायक जय हे" था। यह भारतीय राष्ट्रगान 'जन गण मन' की प्रारंभिक पंक्ति है, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था। इस गाने को राष्ट्रीय गान के रूप में भारतीय संसद ने 1950 में स्वीकार किया था।


रवींद्रनाथ टैगोर का असली नाम क्या है?

रवींद्रनाथ टैगोर का असली नाम "रबींद्रनाथ ठाकुर" था। वे बंगाली परिवार में पैदा हुए थे और उनके परिवार के सदस्यों ने उन्हें "रबींद्रनाथ" के रूप में पुकारा। हालांकि, उनके परिवार की परंपरा में नामों के अर्थ को महत्व नहीं दिया जाता था, और वे अपने लेखन में अक्सर "रवींद्रनाथ ठाकुर" के रूप में जाने जाते थे।


रवींद्रनाथ टैगोर के अंतिम शब्द क्या थे?

रवींद्रनाथ टैगोर के अंतिम शब्द "मुझे फिर आशा नहीं होगी" थे। यह उनके आख़िरी चिट्ठी में लिखे गए थे, जो उन्होंने उनके दोस्त और ग्रंथकार जगदीशचंद्र बोसे को भेजी थी। इस चिट्ठी में वे अपने जीवन के अंत के नजदीक थे और अपने दोस्त को बिदाई देते हुए यह अंतिम शब्द लिखे थे। इस चिट्ठी के बाद, रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु हो गई थी।


नोट: ऊपर दिए गए जानकारी केवल सामान्य ज्ञान के आधार पर है। 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने

संपर्क फ़ॉर्म